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मंगलवार, 17 जुलाई 2012

वह खून किस मतलब का, जिसमें उबाल नहीं


वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं । 
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं । 
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन, न रवानी है ! 
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है ! 
उस दिन लोगों ने सही-सही, खून की कीमत पहचानी थी । 
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी ।
 बोले, स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्हें करना होगा । 
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा । 
आज़ादी के चरणों में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी । 
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी । 
आजादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है ? 
यह शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है” 
यूँ कहते-कहते वक्ता की, ऑंखें में खून उतर आया ! 
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया ! 
आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,”रक्त मुझे देना । 
इसके बदले भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना ।” 
हो गई उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे । 
स्वर इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे । 
“हम देंगे-देंगे खून”, शब्द बस यही सुनाई देते थे । 
रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे । 
 बोले सुभाष,” इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है । 
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं, आकर हस्ताक्षर करता है ? 
इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्व-समर्पण करना है। 
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है । 
लेकिन यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है । 
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्जवल रक्त गिराना है ! 
वह आगे आए जिसके तन में, भारतीय खून बहता हो। 
वह आगे आए जो अपने को, हिंदुस्तानी कहता हो ! 
वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्ताक्षर करता हो ! 
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो ! 
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं ! 
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढ़ाते हैं ! 
साहस से बढ़े युवक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे ! 
चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे ! 
फिर उस रक्त की स्याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे ! 
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे | 
उस दिन तारों ना देखा था, हिंदुस्तानी विश्वास नया। 
जब लिखा था महा रणवीरों ने, खून से अपना इतिहास नया ||

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