बहन स्वर्गीय शकुन्तला जैन की दिनांक 31 जनवरी 2023 को 38वीं पुण्यतिथि के अवसर पर परिवार के सभी सदस्य भाव-विभोर होकर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जो हमारे लिए सदास्मणीय और प्रेरणास्त्रोत है। हम उनके दिखाए मार्गदर्शन पर चलते हुए कार्य करते रहेंगे। शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन ब्लॉग और शकुन्तला एडवरटाईजिंग एजेंसी, शकुन्तला महिला कल्याण कोष, शकुन्तला इंटरप्राइज, शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन परिवार द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र/पत्रिका बहन स्वर्गीय शकुन्तला जैन को समर्पित है।
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आईये! हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में टिप्पणी लिखकर भारत माता की शान बढ़ाये.अगर आपको हिंदी में विचार/टिप्पणी/लेख लिखने में परेशानी हो रही हो. तब नीचे दिए बॉक्स में रोमन लिपि में लिखकर स्पेस दें. फिर आपका वो शब्द हिंदी में बदल जाएगा. उदाहरण के तौर पर-tirthnkar mahavir लिखें और स्पेस दें आपका यह शब्द "तीर्थंकर महावीर" में बदल जायेगा. कृपया "शकुन्तला प्रेस ऑफ इंडिया प्रकाशन" ब्लॉग पर विचार/टिप्पणी/लेख हिंदी में ही लिखें.
बुधवार, 23 जुलाई 2014
जीवन का लक्ष्य (16-31 अक्टूबर 2009) पाक्षिक समाचार पत्र
मैं मानता हूँ कि मेरी कलम किसी को न्याय नहीं दे सकती है. मगर अपनी कलम से पूरी ईमानदारी के साथ यदि किसी के ऊपर अन्याय हो रहा है. तब उसको लेखन द्वारा उच्च अधिकारीयों तक पहुंचा दूँ. इस अख़बार के प्रथम पेज पर छपी खबर(मोबाईल चोरी के शक में युवक की तार से गला घोंटकर हत्या ) के बारें में मुझे जब अपने विश्वनीय सूत्रों से मालूम हुआ कि उपरोक्त केस पुलिस पैसे लेकर रफा-दफा करने के चक्कर में है. तभी मैंने थाने में जाकर उपरोक्त घटना का पूरा विवरण लिया उसके बाद पीड़ित पक्ष से मिला और अपने अख़बार में छपने से पहले हर रोज के अख़बारों के पत्रकारों के माध्यम से राष्ट्रिय अख़बारों में उपरोक्त घटना को प्रिंट करवाया. जिससे पुलिस के ऊपर दबाब बना और उसको आरोपितों की गिरफ्तारी दिखानी पड़ी. मेरी पत्रकारिता में काफी ऐसे अवसर आये है कि मेरे सूत्रों और आम आदमी ने किसी घटना की सूचना पुलिस को देने से पहले मुझे दी और अनेक बार मैंने पुलिस को फोन करके घटनास्थल पर बुलाया था. मैंने अपनी पत्रकारिता को लेकर सूत्रों और आम आदमी में यह विश्वास कायम किया था कि आपका नाम का जिक्र कभी नहीं आएगा. बेशक कोई कुत्ते की मौत मारे या धोखे से कभी मुझे मरवा दें. आप बिना झिझक के मुझे घटना और उसकी सच्चाई से अवगत करवाएं. मेरे बारें में यह मशहूर था कि एक बार कोई ख़बर सिरफिरे को पता चल जाये फिर खबर को खरीद या दबा नहीं सकता है, क्योंकि मुझे पत्रकारिता के शुरू से धन-दौलत से इतना मोह नहीं रहा है. हाँ, अपनी मेहनत और पसीने की कमाई का एक रुपया किसी के पास नहीं छोड़ता था. यदि शुरू में किसी ताकतवर व्यक्ति ने या किसी ने अपनी दबंगता के चलते रख भी लिए तो मैंने उसका कभी कोई अहित नहीं किया. मगर मेरे पैसे उसके पाप के घड़े की आखिरी बूंद साबित हुए. भगवान ने उनको ऐसी सजा दी कि काफी लोग तो दस-पन्दह साल तक भी उबर नहीं पायें. इसलिए मैं अपनी कलम से केवल दूसरो का हित करने की सोचता हूँ.
मंगलवार, 22 जुलाई 2014
जीवन का लक्ष्य (1-15 दिसम्बर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
मेरे फेसबुक के सभी दोस्त "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र के नए अंक को पढ़ें. आप भी पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के लिए भेजें. यदि फेसबुक के मेरे सभी दोस्त या पाठक "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो http://shakuntalapress.blogspot.in/ यहाँ पर जाकर जहाँ पर यह (यहाँ आप अपना ईमेल भरकर नई प्रकाशित सामग्री ईमेल पर ही प्राप्त कर सकते हैं) लिखा है. अपनी ईमेल भर दें. उसके बाद आपको अपने आप ईमेल से "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र का नया अंक मिल जायेगा. दोस्तों व पाठकों, अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे समाचार पत्र की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं. आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-आप अपनी टिप्पणियों में गुप्त अंगों का नाम लेते हुए और अपशब्दों का प्रयोग करते हुए टिप्पणी ना करें. मैं ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. आप स्वस्थ मानसिकता का परिचय देते हुए तर्क-वितर्क करते हुए हिंदी में टिप्पणी करें.
जीवन का लक्ष्य (16-30 नवम्बर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
मेरे फेसबुक के सभी दोस्त "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र के नए अंक को पढ़ें. आप भी पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के लिए भेजें. यदि फेसबुक के मेरे सभी दोस्त या पाठक "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो http://shakuntalapress.blogspot.in/ यहाँ पर जाकर जहाँ पर यह (यहाँ आप अपना ईमेल भरकर नई प्रकाशित सामग्री ईमेल पर ही प्राप्त कर सकते हैं) लिखा है. अपनी ईमेल भर दें. उसके बाद आपको अपने आप ईमेल से "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र का नया अंक मिल जायेगा.
दोस्तों व पाठकों, अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे समाचार पत्र की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं. आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-आप अपनी टिप्पणियों में गुप्त अंगों का नाम लेते हुए और अपशब्दों का प्रयोग करते हुए टिप्पणी ना करें. मैं ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. आप स्वस्थ मानसिकता का परिचय देते हुए तर्क-वितर्क करते हुए हिंदी में टिप्पणी करें.
जीवन का लक्ष्य (1-15 नवम्बर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
मेरे फेसबुक के सभी दोस्त "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र के नए अंक को पढ़ें. आप भी पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के लिए भेजें. यदि फेसबुक के मेरे सभी दोस्त या पाठक "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो http://shakuntalapress.blogspot.in/ यहाँ पर जाकर जहाँ पर यह (यहाँ आप अपना ईमेल भरकर नई प्रकाशित सामग्री ईमेल पर ही प्राप्त कर सकते हैं) लिखा है. अपनी ईमेल भर दें. उसके बाद आपको अपने आप ईमेल से "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र का नया अंक मिल जायेगा. दोस्तों व पाठकों, अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे समाचार पत्र की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं. आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-आप अपनी टिप्पणियों में गुप्त अंगों का नाम लेते हुए और अपशब्दों का प्रयोग करते हुए टिप्पणी ना करें. मैं ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. आप स्वस्थ मानसिकता का परिचय देते हुए तर्क-वितर्क करते हुए हिंदी में टिप्पणी करें.
जीवन का लक्ष्य (16-31अक्टूबर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
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जीवन का लक्ष्य (1-15 अक्टूबर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
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जीवन का लक्ष्य (16-30 सितम्बर 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
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जीवन का लक्ष्य (16-31 मार्च 2008) पाक्षिक समाचार पत्र
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जीवन का लक्ष्य (1-15 अप्रैल 2007) पाक्षिक समाचार पत्र
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जीवन का लक्ष्य (1-15 मार्च 2007) पाक्षिक समाचार पत्र
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सोमवार, 21 जुलाई 2014
जीवन का लक्ष्य (16-31 अगस्त 2004) पाक्षिक समाचार पत्र
अख़बार "जीवन का लक्ष्य" के पुराने अंको की कहानी
दोस्तों, पिछले विगत दिन 29 जून से एम.टी.एन.एल का इंटरनेट खराब था जोकि 19 जुलाई को शाम चार बजे ठीक हुआ. इस कारण अपनी सारी घर-परिवार व व्यवसाय की जिम्मेदारी पूरी करने के बाद बचे हुए समय (जो फेसबुक और सोशल वेबसाईट पर लगाता था) में मैंने अपने कुछ(मेरे पास पहले अपना पी.सी नहीं था और सारा काम बाहर होता था. इस कारण से सभी अंको की फ़ाइल को फ्लोपी या सी.डी आदि में कॉपी नहीं करके देते थें, क्योंकि अख़बार का एक बार लेआउट (फोर्मेट)सेट होने के बाद अगले अंक के लिए केवल समाचार ही बदलने होते थें. उनको डर होता था कि कहीं और से काम ना करवाने लग जाये जैन साहब) पुराने अंको की पी.डी.ऍफ़ बनाने के लिए उसमें जो सुधार की जरूरत थी. उनको ठीक करके कुछ पुराने अंको की पी.डी.ऍफ़ फ़ाइल बनाकर आपके पढने योग्य बनाया है.
यदि इन अंको में आपको कोई कमी या गलती नजर आती है. तब उसको मेरे ध्यान में जरुर लाये. कुछ ऐसी गलतियाँ भी होगी जो अख़बार के सोफ्टवेयर पेजमेकर से पी.डी.ऍफ़ फ़ाइल में बदलने पर आती है. जिनके लिए अनेक उपाय है. यदि आप मेरे ध्यान में लायेगे तो मुझे उनको भी ठीक करने का अवसर मिलेगा. यह सब(पेजमेकर से पी.डी.ऍफ़ फ़ाइल बनाना)करना मुझे मेरे गुरुदेव श्री दिनेशराय द्विवेदी जी के बेटे वैभव द्विवेदी के कारण आया है. जिससे मेरा अख़बार आप सभी भी पढ़ सकते है.
मेरे कुछ पुराने अख़बारों में मेरे विचार और समाचार पढ़कर आपको भी पता चल पायेगा कि मैं कैसे अपनी पत्रकारिता की दुनियां में पहले "सिरफिरा" था और अब निर्भीक हूँ. मेरा विश्वास है कि आप देखेंगे मैंने हमेशा अपनी पत्रकारिता में शेर की माँद में घुसकर शेर को ललकारा है. जब मौत एक दिन आनी है फिर डर कैसा? सौ दिन घुट-घुटकर मरने से तो एक दिन शान से जीना कहीं बेहतर है. मेरा बस यहीं कहना है कि-आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा. फिर क्यों नहीं तुम ऐसा करो कि तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनिया हमेशा याद रखें. धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य कर्म कमाना ही बड़ी बात है और "हमें ज़मीर बेचना आया ही नहीं, वरना दौलत कमाना इतना भी मुश्किल नहीं"
मेरे फेसबुक के सभी दोस्त "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र के नए अंक को पढ़ें. आप भी पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के लिए भेजें. यदि फेसबुक के मेरे सभी दोस्त या पाठक "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो http://shakuntalapress.blogspot.in/ यहाँ पर जाकर जहाँ पर यह (यहाँ आप अपना ईमेल भरकर नई प्रकाशित सामग्री ईमेल पर ही प्राप्त कर सकते हैं) लिखा है. अपनी ईमेल भर दें. उसके बाद आपको अपने आप ईमेल से "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र का नया अंक मिल जायेगा.
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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
"जीवन का लक्ष्य" (1-15 January 2014) पाक्षिक समाचार पत्र
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"जीवन का लक्ष्य" (1-15 Dec.2013) पाक्षिक समाचार पत्र
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हमारी या हमारे समाचार पत्र की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें
और हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ
ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं. आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति
की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र
अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-आप अपनी टिप्पणियों में गुप्त अंगों का नाम
लेते हुए और अपशब्दों का प्रयोग करते हुए टिप्पणी ना करें. मैं ऐसी
टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. आप स्वस्थ मानसिकता का परिचय देते हुए
तर्क-वितर्क करते हुए हिंदी में टिप्पणी करें
मंगलवार, 19 नवंबर 2013
"जीवन का लक्ष्य" पाक्षिक समाचार पत्र पढ़ें
दोस्तों व पाठकों, अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. आप हमारी या हमारे समाचार पत्र की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें और हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं. आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन आप सभी पाठकों और दोस्तों से हमारी विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-आप अपनी टिप्पणियों में गुप्त अंगों का नाम लेते हुए और अपशब्दों का प्रयोग करते हुए टिप्पणी ना करें. मैं ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करूँगा. आप स्वस्थ मानसिकता का परिचय देते हुए तर्क-वितर्क करते हुए हिंदी में टिप्पणी करें
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013
"जीवन का लक्ष्य" पाक्षिक समाचार पत्र पढ़ें.जनवरी(द्धितीय)2013
जीवन का लक्ष्य पाक्षिक समाचार पत्र का
16-31 जनवरी 2013 का अंक पढ़ें.
मेरे फेसबुक के सभी दोस्त "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र के नए अंक को पढ़ें. मुझे आज ही पीडीएफ फाइल से जेपीजी फाइल बनानी आई है. आप भी पढ़ें और दूसरों को पढ़ने के लिए भेजें. यदि फेसबुक के मेरे सभी दोस्त या पाठक "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो http://shakuntalapress.blogspot.in/ यहाँ पर जाकर जहाँ पर यह (यहाँ आप अपना ईमेल भरकर नई प्रकाशित सामग्री ईमेल पर ही प्राप्त कर सकते हैं) लिखा है. अपनी ईमेल भर दें. उसके बाद आपको अपने आप ईमेल से "जीवन का लक्ष्य " समाचार पत्र का नया अंक मिल जायेगा.
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शनिवार, 22 सितंबर 2012
पत्नी को पगार देंगे, बर्खास्तगी का अधिकार भी चाहिए ?
नई दिल्ली : पत्नी को हर माह पति के वेतन में से एक हिस्सा देने के प्रस्तावित
कानून के खिलाफ पुरुष संगठन सामने आ गए हैं। 'सेव फैमिली फाउंडेशन' ने केंद्रीय
महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ को पत्र लिखकर नए प्रस्ताव को तत्काल
प्रभाव से रद्द करने की मांग की है। विभिन्न राज्यों के लगभग 40 पुरुष संगठनों का
प्रतिनिधित्व करने वाले फाउंडेशन ने इस प्रस्ताव को एकतरफा करार दिया है। संगठन
ने इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी हस्तक्षेप करने की अपील की है।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार बहुत जल्द एक ऐसा कानून लाने पर विचार कर रही है
जिसके लागू होने के बाद हर पति के लिए अपनी पत्नी को प्रतिमाह एक तय वेतन देना
अनिवार्य होगा।
प्रस्ताव का विरोध करते हुए फाउंडेशन के संस्थापक सदस्य स्वरूप
सरकार ने कहा, 'सरकार को जेंडर न्यूट्रल कानूनों को तरजीह देना चाहिए। ऐसा कोई
कानून नहीं बनाना चाहिए जिससे समाज में विरोध पैदा हो। केंद्रीय महिला एवं बाल
विकास मंत्रालय सिर्फ महिलाओं के हित की बात करते हुए प्रतिमाह वेतन की वकालत कर
रहा है। लेकिन सरकार में कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि पुरुष अपनी
पूरी तनख्वाह पत्नी को ही देता है।' स्वरूप सरकार ने आगे बताया कि उनके संगठन ने
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ को पत्र लिखकर नए प्रस्ताव को
तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग की है।
.. तो बर्खास्त करने का भी हो अधिकार
बेंगलुरू स्थित कॉन्फिडेयर रिसर्च में जेंडर स्टडीज विभाग
के प्रमुख वीराज धूलिया का कहना है कि अगर केंद्र सरकार, पत्नियों को मासिक वेतन
देने का कानून बनाती है तो फिर घर में ऑफिस की सभी शर्तें भी लागू होनी चाहिए।
मसलन, पति घर में होने वाले सभी घरेलू काम की समीक्षा भी करे। अच्छे और बुरे काम के
हिसाब से तनख्वाह में कटौती करे और अगर पत्नी सही काम नहीं करे तो उसे बर्खास्त भी
कर सके। इसके अलावा मसौदे में यह जिक्र भी किया जाए कि पति अपनी पत्नी को कपड़े,
घूमने-फिरने और सौंदर्य-प्रसाधन जैसे अन्य खर्च के लिए राशि देने को बाध्य नहीं
होगा।
महिलाएं भी चाहती हैं बदलाव
महिला अधिकारों पर काम करने
वाली सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील बृंदा ग्रोवर का कहना है कि केंद्र सरकार को नए
प्रस्ताव में पत्नी को वेतन की बजाए संपत्ति पर बराबर का अधिकार दिलवाने का कानून
बनाना चाहिए। तनख्वाह दिलवाने का प्रस्ताव बेहतर सुनाई दे रहा है, लेकिन इससे पति
के मालिक और पत्नी के नौकरानी होने जैसा भी अहसास होता है। महिला सशक्तीकरण पर काम
करने वाली लेखिका सादिया देहलवी का कहना है कि सरकार पति को पत्नी के लिए फिक्स्ड
डिपॉजिट या पॉलिसी जैसे तरीकों से भी हिस्सेदारी दे तो महिलाओं को ज्यादा सामाजिक
सुरक्षा मिल पाएगी।
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
कैसे पता लगाया जाए पत्नी वर्जिन है या नहीं
भारत
में शादी से पहले सेक्स पर रूढ़ीवादी रवैया है, हालांकि शहरों और क़स्बों
में इसके प्रति लचीला रूख़ सामने आ रहा है. एक भारतीय कंपनी ने दावा किया
है कि वो योनि का ढीलापन ख़त्म करने वाली देश की पहली क्रीम बाज़ार में ला
रही है, जिसके विज्ञापन के अनुसार महिलाएं एक बार फिर कौमार्य का अहसास कर
पाएंगी. कंपनी का मानना है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण होगा लेकिन आलोचक
कह रहे हैं कि इससे उल्टे नारी सशक्तिकरण पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. ये एक
बड़ा दावा है.
‘18 अगेन’ क्रीम के विज्ञापन में साड़ी पहने एक महिला
नाच-गा रही है. विज्ञापन बॉलीवुड स्टाइल में है और महिला मैडोना का हिट
गाना ‘आई फ़ील लाइक ए वर्जिन’ गुनगुना रही है. उसके सास-ससुर स्तब्ध हैं.
जल्द ही महिला का पति भी नाच-गाने में शामिल हो जाता है. शुरू में नाक-भौं
सिकोड़ती सास आख़िर में इस क्रीम को ऑनलाइन ख़रीदने की प्रक्रिया में दिखती
है.
18 अगेन क्रीम को बनाने वाली मुंबई स्थित फ़ार्मा कंपनी
अल्ट्राटेक के अनुसार भारत में ये उत्पाद पहली बार मिल रहा है. अल्ट्राटेक
के मालिक ऋषि भाटिया कहते हैं कि करीब ढाई हज़ार रुपए में मिलने वाली ये
क्रीम सोने की भस्म, एलो वेरा यानि घृतकुमारी, बादाम और अनार जैसे पदार्थों
से बनी है. और इसके क्लीनिकल टेस्ट भी हो चुके हैं. ऋषि भाटिया कहते
हैं, “ये एक अनूठा और क्रांतिकारी उत्पाद है जो महिलाओं के आत्मविश्वास को
मज़बूत करने और उनके आत्मसम्मान को बढ़ाने में भी सहायता करता है. ” भाटिया
कहते हैं कि 18 अगेन का लक्ष्य महिलाओं का सशक्तिकरण है. उनके मुताबिक ये
उत्पाद कौमार्य बहाल करने का दावा नहीं कर रहा है बल्कि सिर्फ़ एक वर्जिन
जैसे अहसास को दोबारा दिलाने की बात कह रहा है.
महिलाओं
के समूह, कुछ डॉक्टर और सोशल मीडिया पर कई लोग कंपनी के प्रचार अभियान की
कड़ी आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है कि ये उत्पाद उस भारतीय सोच का
समर्थन करता है जिसमें शादी से पहले सेक्स को हीन नज़र से देखा जाता है और
कुछ तो इसे ‘पाप’ भी क़रार देते हैं. नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमैन की
एनी राजा कहती हैं, “इस तरह की क्रीम बिल्कुल बकवास है और इससे कुछ महिलाओं
में हीन भावना भी आ सकती है. महिलाओं को विवाह तक वर्जिन क्यों रहना
चाहिए? किसी पुरुष के साथ संभोग महिला का अपना अधिकार है लेकिन यहां समाज
अब भी महिलाओं को दुल्हन बनने तक इंतज़ार के लिए कहता है. ” एनी राजा कहती
हैं कि सशक्तिकरण से उलट ये क्रीम पितृसत्तात्मक समाज की उस मान्यता को
मजबूत करेगी जिस के अनुसार हर पुरूष अपनी पहली रात एक वर्जिन पत्नी के साथ
ही मनाना चाहता है. मुंबई मिरर और बैंगलोर मिरर समाचार पत्रों में सेक्स पर
सलाह देने वाली कॉलम के लेखक गायनोकोलॉजिस्ट डॉक्टर महिंदा वत्स कहते हैं,
“वर्जिन होने को अब भी बड़ी चीज़ माना जाता है. मुझे नहीं लगता कि इस सदी
में ये धारणा बदलने वाली है. ” डॉ. वत्स ने सेक्स से संबंधित 30 हज़ार से
अधिक प्रश्नों के उत्तर दिए हैं और वो कहते हैं कि उनसे बहुत से मर्द पूछते
हैं कि ये कैसे पता लगाया जाए कि उनकी पत्नी वर्जिन है या नहीं. उनसे
महिलाएं भी पूछतीं है कि वो अपने पतियों से कैसे छिपाएं कि वो वर्जिन नहीं
हैं. डॉ. महिंदा वत्स कहते हैं, “हर पुरुष को आस होती है कि वर्जिन से शादी
कर रहा है लेकिन कम से कम भारत के शहरों और क़स्बों में तो लड़कियां शादी
से पहले संभोग कर रही हैं. ” वत्स कहते हैं कि कामकाजी
महिलाओं में पुरुषों के साथ संबंधों के विषय में आत्मविश्वास आया है. एक
वेबसाइट पर सेक्स संबंधी सेहत से जुड़ी सलाह देने वाली डॉ निसरीन नखोडा
कहती हैं, “ये तो पक्का है कि भारत में अब पहले से कहीं ज़्यादा विवाह
पूर्व सेक्स संबंध बन रहे हैं.” डॉ. नखोडा कहती हैं, “मुझे नहीं पता कि 18
अगेन क्या करेगी क्योंकि योनि को मांसपेशियां सुडौल बनाती हैं. पता नहीं एक
क्रीम ये काम कैसे करेगी.” लेकिन वो मानती हैं कि ऐसी क्रीम भारत में
ख़ूब कमाई कर सकती है क्योंकि हालात तो बदल रहे हैं लेकिन धारणाएं नहीं.
पिछले साल इंडिया टुडे पत्रिका में छपे एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में
सिर्फ़ पांच से एक व्यक्ति ही विवाह-पूर्व सेक्स या लिव-इन संबंध यानी बिना
शादी के महिला और पुरुष के साथ रहने के पक्ष में था. जबकि एक चौथाई लोगों
ने कहा कि उन्हें शादी से पहले सेक्स से गुरेज़ नहीं है बशर्ते से उनके
परिवार में ना हो रहा हो. एक 26 वर्षीय वर्जिन महिला ने कहा, “हमें ये
कहते हुए पाला जाता है कि सेक्स संबंध स्थापित करना भद्दा काम है. जब आप
युवा हों तब बॉयफ़्रेंड का होना बहुत मुश्किल होता है. मेरे जिन दोस्तों के
बॉयफ़्रेंड थे भी, उन्हें अपने परिवार से ख़ूब झूठ बोलना पड़ता था. ”
एक अन्य 27 वर्षीय महिला, जिसने पहली बार 20 वर्ष की उम्र में सेक्स संबंध बनाए थे और जिसके अब तक तीन ऐसे पार्टनर रह चुके हैं, वो कहती हैं कि पुरूष महिलाओं पर मालिकाना हक़ जताना चाहते हैं. इस महिला के अनुसार कई पार्टनर के साथ संभोग करने वाली महिला को वेश्या समझे जाने का डर तो दुनिया के सभी समाजों मौजूद है. डॉक्टर नसरीन नखोडा कहती हैं, “भारतीय मानसिकता एक बेचैनी के दौर से गुज़र रही है. नई पीढ़ी ‘कूल’ बनाना चाहती है और वो शादी से पहले सेक्स को आज़माना चाहती है लेकिन उन्हें एक परंपरागत तरीके से बड़ा किया जा रहा है जहां शादी से पहले सेक्स एक पाप है. इससे कई युवाओं में असमंजस की स्थिति है.” योनि के ढीलेपन को दूर करने का दावा करने वाली क्रीम से पहले योनि की चमड़ी को गोरा करने वाली क्रीम पर भी विवाद हो चुका है. ये दोनों इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे भारत में परंपरागत मूल्य नए विचारों से टकरा रहे हैं. महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली एनी राजा कहती हैं कि ऐसे उत्पादों का उद्देश्य महिलाओं के व्यवहार और चेहरे-मोहरे का नियंत्रण पुरूषों को देना है. लेकिन 18 अगेन बनाने वाली कंपनी के ऋषि भाटिया कहते हैं कि इस बार में शोर-शराबा ग़ैर-ज़रूरी है. ऋषि भाटिया कहते हैं, “पुरूष सेक्स का मज़ा बढ़ाने के लिए कई उत्पादों का प्रयोग करते हैं, ये तो महिला के हाथ में संभोग का सुख बढ़ाने का ज़रिया मात्र है.”
मंगलवार, 28 अगस्त 2012
पत्नी ने किया विरोध बिना इजाजत स्पर्म डोनेशन का
लंदन। एक ब्रिटिश महिला ने ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एंब्रयोलॉजी अथॉरिटी (एचएफईए) से स्पर्म को 'वैवाहिक संपत्ति' घोषित करने की मांग की है। दरअसल, महिला के पति ने उसे बगैर बताए एक क्लिनिक में स्पर्म डोनेट किए थे। ब्रिटिश अखबार 'डेली मेल' ने इस महिला की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। कहा जा रहा है कि महिला को इस बात का डर है कि पति के स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चे उसके बेटे के सौतेले भाई या बहन होंगे और वे एक दिन पति से जुड़ कर उसके परिवार को परेशानी में डाल सकते हैं। महिला ने ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एंब्रयोलॉजी अथॉरिटी सेस्पर्म डोनेशन के लिए गाइडलाइंस बनाने की मांग की है।
गौरतलब है कि वर्ष 2005 में ब्रिटेन की एक कोर्ट ने आदेश दिया था कि एक स्पर्म डोनर सिर्फ 10 परिवारों को ही स्पर्म डोनेट कर सकता है। इतना ही नहीं, यदि डोनर बच्चा बालिग होने के बाद अपने बॉयलॉजिकल पिता के बारे में जानना चाहे तो उसे बताना होगा। पिता के बारे में जानना उसका अधिकार होगा। भारत में यदि कोई स्पर्म डोनेट करना चाहे तो उसे मात्र दो सौ रुपये ही मिलते हैं। जबकि ब्रिटेन जैसे मुल्कों में स्पर्म डोनेशन का 2500 रुपये तक मिल जाता है।
स्पर्म डोनेशन की प्रक्रिया: बिजनेस करने वाली कंपनियां कॉलेज स्टूडेंट्स के साथ वर्कशॉप करती हैं। काउंसलिंग करती हैं। स्पर्म डोनेशन के सामाजिक पहलू के बारे में बताती हैं। जो स्टूडेंट तैयार होते हैं उन्हें मेडिकल टेस्ट देना होता है। अगर उन्हें कोई यौन या दूसरी बीमारी नहीं है, तो एक निश्चित अवधि का कॉन्ट्रैक्ट भरवाया जाता है। फिर उन्हें हफ्ते में दो बार कंपनी की लैब आकर स्पर्म डोनेट करना होता है। ब्लड डोनेशन की तरह यह एक सोशल कॉज है, इसके बदले कोई पैसा नहीं दिया जाता। स्टूडेंट दूर से आता है तो कंपनी ट्रांसपोर्ट खर्च दे देती हैं। डोनर से इकट्ठा करने के बाद स्पर्म को ‘-196 डिग्री सेल्सियस’ पर लिक्विड नाइट्रोजन में स्टोर किया जाता है। डोनर से स्पर्म इकट्ठा करने वाली कंपनियों के क्लाइंट आम तौर पर डॉक्टर या हॉस्पिटल होते हैं। उनके पास पुरुष में कम स्पर्म काउंट वाले केस आते हैं। डॉक्टर कंपनियों को जरूरतमंद के वजन, लंबाई और स्किन कलर जैसी जानकारी भेजते हैं। कंपनियां मेल खाता सैंपल डॉक्टरों को भेजती हैं। कंपनियां एक सैंपल 650 रुपए में बेचती हैं, डॉक्टर इसे 900 से 1200 रुपए में पेशेंट को देते हैं। डोनर की पहचान गुप्त रखी जाती है। उससे यह साइन भी करवाया जाता है कि अगर बाद में पता भी चल गया, तो उस औलाद पर डोनर का कोई हक नहीं होगा।
बिना इजाजत पति के स्पर्म डोनेशन के विरोध में आवाज उठाने वाली ब्रिटिश महिला की पहचान गुप्त रखी गई है। यह महिला बिजनेस करती है। उसका कहना है कि मेरे पति ने बिना मेरी मर्जी जाने अपना स्पर्म डोनेट कर दिया। जब मैंने क्लिनिक से संपर्क किया तो उनकी ओर से भी मुझे नहीं बताया गया कि वे मेरे पति का स्पर्म यूज कर रहे हैं। मुझे इस बात का डर है कि इस स्पर्म से होने वाला बच्चा बालिग होने के बाद मेरे परिवार, मेरी जिंदगी और मेरे बच्चों के लिए कोई मुसीबत न खड़ी कर दे। इस महिला का यह भी कहना है कि मेरे पति के स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों से मेरा इमोशनल अटैचमेंट होगा। मैं चाह कर भी उसे दूर नहीं कर पाऊंगी। इसलिए बिना पत्नी की सहमति के पति द्वारा स्पर्म डोनेट करने पर पाबंदी जरूरी है। इस महिला ने डायने ब्लड से भी मुलाकात की। ब्लड ने ही इस महिला के पति के स्पर्म से दो बच्चों को जन्म दिया है। उनके पति की मौत काफी पहले हो चुकी है। वह इन बच्चों के सहारे अपने पति की संपत्ति की कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। ब्रिटेन में स्पर्म डोनर को किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है लेकिन उसे यात्रा और अन्य भुगतान के रूप में कुछ राशि दी जा सकती है। डोनर लाईसेंस प्राप्त क्लिनिक के माध्यम से ही स्पर्म डोनेट कर सकता है। स्पर्म डोनेट करने वाले आदमी की मर्जी के बिना उसका यूज नहीं किया जा सकता है। वह ऐन वक्त पर स्पर्म के यूज से मना कर सकता है। एचईएफए बोर्ड के पूर्व सदस्य और लंदन के होमर्टन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के डॉक्टर गुलाम बहादुर इस बात से खुश हैं कि कम से कम ऐसे इश्यू को उठाया तो गया। वह कहते हें कि जो आदमी स्पर्म दे रहा है, उसका उसकी पत्नी और परिवार पर क्या असर पड़ रहा है, उसे पूरी तरह इग्नोर नहीं किया जा सकता है।
गौरतलब है कि वर्ष 2005 में ब्रिटेन की एक कोर्ट ने आदेश दिया था कि एक स्पर्म डोनर सिर्फ 10 परिवारों को ही स्पर्म डोनेट कर सकता है। इतना ही नहीं, यदि डोनर बच्चा बालिग होने के बाद अपने बॉयलॉजिकल पिता के बारे में जानना चाहे तो उसे बताना होगा। पिता के बारे में जानना उसका अधिकार होगा। भारत में यदि कोई स्पर्म डोनेट करना चाहे तो उसे मात्र दो सौ रुपये ही मिलते हैं। जबकि ब्रिटेन जैसे मुल्कों में स्पर्म डोनेशन का 2500 रुपये तक मिल जाता है।
स्पर्म डोनेशन की प्रक्रिया: बिजनेस करने वाली कंपनियां कॉलेज स्टूडेंट्स के साथ वर्कशॉप करती हैं। काउंसलिंग करती हैं। स्पर्म डोनेशन के सामाजिक पहलू के बारे में बताती हैं। जो स्टूडेंट तैयार होते हैं उन्हें मेडिकल टेस्ट देना होता है। अगर उन्हें कोई यौन या दूसरी बीमारी नहीं है, तो एक निश्चित अवधि का कॉन्ट्रैक्ट भरवाया जाता है। फिर उन्हें हफ्ते में दो बार कंपनी की लैब आकर स्पर्म डोनेट करना होता है। ब्लड डोनेशन की तरह यह एक सोशल कॉज है, इसके बदले कोई पैसा नहीं दिया जाता। स्टूडेंट दूर से आता है तो कंपनी ट्रांसपोर्ट खर्च दे देती हैं। डोनर से इकट्ठा करने के बाद स्पर्म को ‘-196 डिग्री सेल्सियस’ पर लिक्विड नाइट्रोजन में स्टोर किया जाता है। डोनर से स्पर्म इकट्ठा करने वाली कंपनियों के क्लाइंट आम तौर पर डॉक्टर या हॉस्पिटल होते हैं। उनके पास पुरुष में कम स्पर्म काउंट वाले केस आते हैं। डॉक्टर कंपनियों को जरूरतमंद के वजन, लंबाई और स्किन कलर जैसी जानकारी भेजते हैं। कंपनियां मेल खाता सैंपल डॉक्टरों को भेजती हैं। कंपनियां एक सैंपल 650 रुपए में बेचती हैं, डॉक्टर इसे 900 से 1200 रुपए में पेशेंट को देते हैं। डोनर की पहचान गुप्त रखी जाती है। उससे यह साइन भी करवाया जाता है कि अगर बाद में पता भी चल गया, तो उस औलाद पर डोनर का कोई हक नहीं होगा।
बिना इजाजत पति के स्पर्म डोनेशन के विरोध में आवाज उठाने वाली ब्रिटिश महिला की पहचान गुप्त रखी गई है। यह महिला बिजनेस करती है। उसका कहना है कि मेरे पति ने बिना मेरी मर्जी जाने अपना स्पर्म डोनेट कर दिया। जब मैंने क्लिनिक से संपर्क किया तो उनकी ओर से भी मुझे नहीं बताया गया कि वे मेरे पति का स्पर्म यूज कर रहे हैं। मुझे इस बात का डर है कि इस स्पर्म से होने वाला बच्चा बालिग होने के बाद मेरे परिवार, मेरी जिंदगी और मेरे बच्चों के लिए कोई मुसीबत न खड़ी कर दे। इस महिला का यह भी कहना है कि मेरे पति के स्पर्म से पैदा होने वाले बच्चों से मेरा इमोशनल अटैचमेंट होगा। मैं चाह कर भी उसे दूर नहीं कर पाऊंगी। इसलिए बिना पत्नी की सहमति के पति द्वारा स्पर्म डोनेट करने पर पाबंदी जरूरी है। इस महिला ने डायने ब्लड से भी मुलाकात की। ब्लड ने ही इस महिला के पति के स्पर्म से दो बच्चों को जन्म दिया है। उनके पति की मौत काफी पहले हो चुकी है। वह इन बच्चों के सहारे अपने पति की संपत्ति की कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। ब्रिटेन में स्पर्म डोनर को किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है लेकिन उसे यात्रा और अन्य भुगतान के रूप में कुछ राशि दी जा सकती है। डोनर लाईसेंस प्राप्त क्लिनिक के माध्यम से ही स्पर्म डोनेट कर सकता है। स्पर्म डोनेट करने वाले आदमी की मर्जी के बिना उसका यूज नहीं किया जा सकता है। वह ऐन वक्त पर स्पर्म के यूज से मना कर सकता है। एचईएफए बोर्ड के पूर्व सदस्य और लंदन के होमर्टन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के डॉक्टर गुलाम बहादुर इस बात से खुश हैं कि कम से कम ऐसे इश्यू को उठाया तो गया। वह कहते हें कि जो आदमी स्पर्म दे रहा है, उसका उसकी पत्नी और परिवार पर क्या असर पड़ रहा है, उसे पूरी तरह इग्नोर नहीं किया जा सकता है।
भारत में वर्ष 2008 में संसद में एक विधेयक लाया गया था। कृत्रिम रूप से बच्चे पैदा करने की तकनीक से जुड़ा यह विधेयक संसद में आज तक पारित नहीं हो पाया। इसमें इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून सुझाए गए थे। डॉक्टर भी देश में ऐसे कानून की मांग करते हैं, जिससे स्पर्म डोनेशन के साथ आईवीएफ तकनीक पर भी ध्यान रखा जा सके। स्पर्म डोनेट करने वालों की सूची रखने के लिए एक केंद्रीय संस्था का गठन होना चाहिए जो एक कानून के तहत काम करे।
भारत में स्पर्म डोनेशन का मुद्दा फिल्म का सब्जेक्ट भी बना। इस विषय पर बनी फिल्म ‘विकी डोनर’ लोकप्रिय रही। इस फिल्म ने देश के युवाओं में कई चीजों की जिज्ञासा जगाई। पहली, स्पर्म डोनेशन क्या है? और कैसे होता है? इस सवाल को लेकर। दूसरा, हाल ही में खबरें आईं कि कुछ लड़कियां फिल्म के प्रॉड्यूसर जॉन अब्राहम के स्पर्म चाहती हैं। बदले में जॉन ने भी कहा था कि ऐसे तो ‘फादर ऑफ द नेशन’ हो जाऊंगा।
'विकी डोनर' फिल्म के हीरो आयुष्मान कहते हैं कि स्पर्म डोनेशन के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए और इसे वह पेशे के रूप में भी अपना सकते हैं। हमारे समाज में लोग इस बारे में बात नहीं करना चाहते मगर विदेशों में स्पर्म डोनेशन को बुरा नहीं मना जाता। अब हम आगे बढ़ रहे हैं ऐसे में हमें समय के साथ अपनी सोच भी बदलनी होगी और इससे किसी का नुकसान भी नहीं है। उनका कहना है कि उन्होंने असल जिंदगी में भी 2004 में रोडीज सीजन-2 की एक टास्क के लिए स्पर्म डोनेट किए हैं।
आपकी राय में क्या स्पर्म डोनेशन में पत्नी की मर्जी का खयाल रखना जरूरी है और स्पर्म को संपत्ति के रूप में ट्रीट किया जा सकता है? आप जो भी सोचते हों, नीचे कमेंट बॉक्स में टाइप कर सबमिट करें...
भारत में स्पर्म डोनेशन का मुद्दा फिल्म का सब्जेक्ट भी बना। इस विषय पर बनी फिल्म ‘विकी डोनर’ लोकप्रिय रही। इस फिल्म ने देश के युवाओं में कई चीजों की जिज्ञासा जगाई। पहली, स्पर्म डोनेशन क्या है? और कैसे होता है? इस सवाल को लेकर। दूसरा, हाल ही में खबरें आईं कि कुछ लड़कियां फिल्म के प्रॉड्यूसर जॉन अब्राहम के स्पर्म चाहती हैं। बदले में जॉन ने भी कहा था कि ऐसे तो ‘फादर ऑफ द नेशन’ हो जाऊंगा।
'विकी डोनर' फिल्म के हीरो आयुष्मान कहते हैं कि स्पर्म डोनेशन के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए और इसे वह पेशे के रूप में भी अपना सकते हैं। हमारे समाज में लोग इस बारे में बात नहीं करना चाहते मगर विदेशों में स्पर्म डोनेशन को बुरा नहीं मना जाता। अब हम आगे बढ़ रहे हैं ऐसे में हमें समय के साथ अपनी सोच भी बदलनी होगी और इससे किसी का नुकसान भी नहीं है। उनका कहना है कि उन्होंने असल जिंदगी में भी 2004 में रोडीज सीजन-2 की एक टास्क के लिए स्पर्म डोनेट किए हैं।
आपकी राय में क्या स्पर्म डोनेशन में पत्नी की मर्जी का खयाल रखना जरूरी है और स्पर्म को संपत्ति के रूप में ट्रीट किया जा सकता है? आप जो भी सोचते हों, नीचे कमेंट बॉक्स में टाइप कर सबमिट करें...
मंगलवार, 17 जुलाई 2012
वह खून किस मतलब का, जिसमें उबाल नहीं
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं
।
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं ।
वह खून कहो किस मतलब
का, जिसमें जीवन, न रवानी है !
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है
!
उस दिन लोगों ने सही-सही, खून की कीमत पहचानी थी ।
जिस दिन सुभाष ने
बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी ।
बोले, स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान
तुम्हें करना होगा ।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा ।
आज़ादी
के चरणों में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी ।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के, फूलों
से गूँथी जाएगी ।
आजादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है ?
यह शीश
कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है”
यूँ कहते-कहते वक्ता की, ऑंखें में
खून उतर आया !
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया !
आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,”रक्त मुझे देना ।
इसके बदले भारत की,
आज़ादी तुम मुझसे लेना ।”
हो गई उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे ।
स्वर
इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे ।
“हम देंगे-देंगे खून”, शब्द बस
यही सुनाई देते थे ।
रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे ।
बोले सुभाष,” इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है ।
लो, यह कागज़, है कौन
यहॉं, आकर हस्ताक्षर करता है ?
इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्व-समर्पण करना
है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है ।
लेकिन यह साधारण पत्र
नहीं, आज़ादी का परवाना है ।
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्जवल रक्त
गिराना है !
वह आगे आए जिसके तन में, भारतीय खून बहता हो।
वह आगे आए जो
अपने को, हिंदुस्तानी कहता हो !
वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्ताक्षर करता
हो !
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो !
सारी जनता हुंकार
उठी- हम आते हैं, हम आते हैं !
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त
चढ़ाते हैं !
साहस से बढ़े युवक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे !
चाकू-छुरी
कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे !
फिर उस रक्त की स्याही में, वे
अपनी कलम डुबाते थे !
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे |
उस
दिन तारों ना देखा था, हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिखा था महा रणवीरों
ने, खून से अपना इतिहास नया ||
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